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रविवार, 8 अप्रैल 2018

नायक हमेशा निर्दोष होते हैं !

दिन भर एक ज़रूरी काम में उलझा रहा।इतना कि सोशल मीडिया भी नहीं झाँक सका।घर पहुँचा तो एक गिलास पानी पीकर ग़लती से न्यूज़ चैनल खोल दिया।यह क्या ! यहाँ तो हाहाकार मचा हुआ था।भाईजान को ‘एक हिरन’ मारने पर जेल हो गई थी।न्यूज़-रूम में विशेषज्ञ पानी पी नहीं रहे थे,बल्कि वह उनकी आँखों से स्वाभाविक रूप से बह रहा था।मुझे पहली बार अपने असंवेदनशील होने का एहसास हुआ।क़ाश,मैंने घर आकर एक गिलास पानी न पिया होता ! मैं चाहकर भी अब ‘राष्ट्रीय-विलाप’ का हिस्सा नहीं बन सकता था।एक और ज़रूरी राष्ट्रीय-कर्तव्य से मैं चूक गया था।इस ‘गिल्ट’ से मैं छटपटाने लगा।मुझे हल्की-सी उम्मीद सोशल मीडिया से लगी।चैनल छोड़कर वहाँ घुसा तो वज्रपात-सा हुआ।रुदन का स्वर वहाँ और तेज था।हमारे अधिकतर मित्र कई घंटे पहले भाईजान के ग़म में ग़लत हो चुके थे।वहाँ कोई ‘स्कोप’ न देखकर वापस मुख्य-धारा में कूद पड़ा।

सबसे तेज़ चैनल पूरी गणना के साथ चेता रहा था कि शेयर बाज़ार भले छह सौ अंक ऊपर चढ़ा हो पर भाई को मिली सज़ा से छह सौ करोड़ रुपए स्वाहा हो जाएँगे।शायद इतनी महत्वपूर्ण जानकारी फ़ैसला सुनाने वाले जज साहब को समय रहते दी गई होती तो राष्ट्र इतने बड़े संकट में न फँसता।देश को हमेशा इस बात का मलाल रहेगा कि चैनल के समझदार एंकर के होते हुए ‘भाई’ ने ग़लत वक़ील क्यों चुन लिया ! वार्ता में शामिल सभी विशेषज्ञ बेहद चिंतित दिख रहे थे।ये वही जानकार थे,जो नोटबंदी के नुक़सान का ठीक-ठीक अनुमान आज तक नहीं लगा पाए थे पर एक अभिनेता के जेल जाने पर सौ तरह के नफ़ा-नुक़सान गिना रहे थे।इनके लिए छह सौ करोड़ की रक़म तो बड़ा शुरुआती आकलन था।यह चपत और बढ़ सकती है।भाईजान अगर जेल में ही पाँच साल बने रहे तो कइयों का कैरियर हमेशा के लिए क़ैद हो जाएगा। यह फ़ैसला दस नहीं कइयों का दम घोट देगा।एक घुटा हुआ विश्लेषक तो बड़ी दूर की कौड़ी ले आया।कहने लगा-अब अभिनेता के घर गणपति-बप्पा कैसे बिराजेंगे ?साम्प्रदायिक-सौहार्द पर बड़ी चोट है यह निर्णय।एक हिरन के लिए हम इतना नुक़सान नहीं उठा सकते।वह ‘टाइगर’ की गोली से नहीं मरता,तो भी शिकार तो वह टाइगर का ही होता ! सरकार को इस पर आवश्यक दख़ल देना चाहिए।ज़रूरत पड़े तो मामले को संविधान-पीठ को भी सौंपा जा सकता है।’

इतनी गंभीर तक़रीर सुनकर मैं भावुक हो गया।ज़्यादा देर यहाँ रुकता तो ख़ुद के असंवेदनशील होने का अहसास लगातार दूसरी बार हो जाता। और भावुक होता,इससे पहले ही चैनल बदल लिया।यह एक सरोकारी चैनल था।इस गिरफ़्तारी से निकले सरोकार बटोरने के लिए एंकर ख़ुद नायक के आवास पर पहुँच गई थी।उसने कैमरामैन से कहा कि वह अपने कैमरे की दृष्टि से नायक के आवास के इर्द-गिर्द छाए अँधेरे को दिखाए।जैसा कि दर्शक देख सकते हैं कि यहाँ कितना अँधेरा पसरा हुआ है ! माफ़ करना, यह अँधेरा आप खुली आँखों से नहीं देख सकते।इसके लिए आपको अपने मन की आँखें खोलनी होंगी।आइए,हम इस काम में आपकी मदद करते हैं।ये जो घर के सामने अभिनेता के चाहने वालों की भीड़ जुटी है,सब उनके लिए दुआ कर रहे हैं।ये जो उठे हुए हाथ आप देख रहे हैं,भले ही रोज़गार से ख़ाली हों,पर दुआओं से लबालब हैं।थोड़ी देर पहले  मैंने इनकी प्रतिक्रिया ली है पर वे दृश्य आपको विचलित कर सकते हैं।हम एक ज़िम्मेदार चैनल हैं।इस नाते ‘विचलित’ होने का काम हम स्वयं कर लेते हैं पर आपको दिखाएँगे नहीं। कृपया यहीं हमारे साथ बने रहें’।

उसके इतने आग्रह के बावजूद मैं अपना ‘विचलन’ रोक नहीं पाया।तीसरे चैनल को खोला तो कुछ राहत मिली।वहाँ इस फ़ैसले पर पड़ोसी-देश की ताज़ा प्रतिक्रिया आ रही थी कि अभिनेता को उसके कर्म के लिए नहीं धर्म के लिए सज़ा मिली है।सुनकर दिल को तसल्ली हुई कि दहशत-गर्द वाले देश में अभी भी हास्य-बोध ख़त्म नहीं हुआ है।वहाँ के हुक्मरान अपनी जनता का ख़ूब अच्छे से ख़याल रख रहे हैं।एक हम हैं जो अपने नायक को मिली सज़ा के लिए ढंग से अफ़सोस भी नहीं ज़ाहिर कर पा रहे हैं।इस अपराध-बोध के चलते हमने तुरंत चैनल बदल दिया।

इस चैनल में नायक की मानवता और उदारता के इक्यावन क़िस्से बताए जा रहे थे।मुझे अफ़सोस हुआ कि पहले ही क्यों नहीं यहाँ आ गया ! ‘बैडबॉय’ से ‘भाईजान’ बन जाने का रोचक सफ़र चल रहा था।न जाने कितनी फुस्स नायिकाओं का कैरियर भाईजान ने सँवारा था।मुझे तो लगने लगा कि हो न हो,भाई ने इस एंकर को भी अपनी दरियादिली का सबूत दिया हो।इस बीच न जाने कब मुझे जम्हाई आ गई।आँख खुली तो देखा कि वही हिरन मेरे सामने खड़ा था।उसका मुझसे भी बुरा हाल था।उसे अपने ऊपर ग्लानि हो रही थी।मैंने उसे सांत्वना दी।वह एकदम से सिसक उठा-‘मैं क्यों ऐसे ‘पुण्यात्मा’ की गोली के रास्ते में आ गया ? मेरी नादानी की वजह से आज सारा राष्ट्र शोक में है।हम आत्मोत्सर्ग के लिए ही पैदा होते हैं।जंगल के टाइगर से बच भी गए तो शहर के ‘टाइगर’ हमें मुक्ति प्रदान करते हैं।ऐसे में भाईजान कहाँ से दोषी हो गए ! मैं स्वयं इस बात की गवाही देने जा रहा हूँ।’

तभी सारे चैनल न्यूज़ ‘तोड़ने’ लगे-भाईजान को ज़मानत मिल गई है ! 



रविवार, 18 मार्च 2018

आरत काह न करइ कुकरमू !

बचपन से सुनते आये हैं कि सेवा में ही मेवा होती है।अब उसका प्रत्यक्ष दर्शन भी हो रहा है।लोग सेवा करने के लिए टूटे पड़ रहे हैं।उन्हें ही देखिए,लंबी छलाँग लगाई है।प्रादेशिक दलदल से सीधे राष्ट्रीय कीचड़ में कूद गए।वे पक्के जनसेवक ठहरे,इसीलिए एक जगह नहीं ठहरते।न किसी खूँटे से बँधे हैं,न विचार से।जनसेवा का ज्वार जब भी आता है, सारे बंधन तोड़ देते हैं।उनके इसी हुनर को अब जाकर राष्ट्रीय पहचान मिली है।क्षेत्रीय-करतब करते-करते वे ऊब गए थे।जैसे ही राष्ट्रीय-फलक पर खिलने का मौक़ा मिला,वे खिलखिला उठे।ज़िंदगी बहुत छोटी है और उनके सेवा-संकल्प बहुत बड़े।इसलिए एक पल भी बिना सेवा के नहीं रह सकते।

सच्चा जनसेवक दूरदर्शी होता है।सर्वदल-समभाव में उसका पक्का यक़ीन ही उसे यायावर बनाता है।वह टिकट-वितरण से समझ लेता है कि उसकी वैतरणी-यात्रा संकट में है।‘अंतर-आत्मा’ की आवाज़ उसे ज़ोर-ज़ोर से पुकारने लगती है।उसके सामने सारे विकल्प खुल जाते हैं और वह नए खोल में आ जाता है।जनसेवा के एक अदद लाइसेंस के लिए पुराने बयान बिना पानी के और बिना पलक झपकाए निगल जाता है।सेवा की ऐसी सुनामी पहले कभी नहीं आई।‘गुन के गाहक सहस नर’ अतीत की बात हो गई।अब तो ऐसे ‘गुणियों’ को चाहने वाला एक ही केंद्रीय भंडार है।ऐसे ‘अमूल्य’ जनसेवक फ़िलहाल यहीं ‘स्टोर’ किए जा रहे हैं।इनको लपकने वाले नेताजी सौभाग्य से हमें गोदाम में ही मिल गए।हम उनसे संवाद करने लगे।

सर,आपने अचानक ‘मास्टर-स्ट्रोक’ मार दिया।यह कैसे किया,कुछ प्रकाश डालेंगे इस पर ?

‘देखिए,’स्ट्रोक’ अचानक ही होता है।इसकी चपेट में कोई भी आ सकता है।हम विरोधियों को अपनों से ज़्यादा सम्मान देते रहे हैं।यह हमारी पार्टी की उदारता का जीवंत प्रमाण है।इनके दल ने इनका तिरस्कार किया और हमने स्वीकारा।शरणागत को हमारी संस्कृति में सम्मान देने की बात कही गई है।अपने अहित की क़ीमत पर शरण आए ‘सेवातुर’ को पकड़ से बाहर नहीं जाने देना चाहिए।

पर आपकी इस ‘पकड़’ पर चौतरफ़ा आलोचना हो रही है।इस पर आप क्या कहेंगे ?

हमारी जितनी भी आलोचना होती है,हम आगे बढ़ते जाते हैं।इसका मतलब यह नहीं कि हमें कुछ सुनाई नहीं देता।दरअसल राजनीति में सुनने से अधिक दिखाई देना अधिक महत्वपूर्ण होता है।रही बात फ़ैसले पर हल्ला मचने की, तो यह भी हमारे फ़ायदे में है ! उधर विरोधी हल्ले में गुल हो जाते हैं और इधर हम रसगुल्ले पर हाथ साफ़ कर जाते हैं।ऐसे लोग हमसे बहुत पीछे खड़े हैं क्योंकि वे हमारे पीछे पड़े हैं।

लेकिन आप यह तो मानेंगे कि इससे आपकी छवि पर असर पड़ा है ?

बिलकुल ठीक कहा।इससे हमारी छवि को लेकर आशंका के बादल छँट गए हैं।जिन लोगों को हमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी,वे भी अब हमारी नई छवि से अभिभूत हैं।जनता को सेवा चाहिए और हमें सेवक।हमारी ताज़ा ‘पकड़’ से दूसरे दल के और जनसेवक भी उत्साहित होंगे।‘सबका साथ,सबका विकास’ की हमारी संकल्पना मज़बूत होगी और इधर-उधर फैली गंदगी एक जगह इकट्ठी हो जाएगी।इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ‘स्वच्छ अभियान’ को मिलेगा।लोग गंगा-स्नान के बजाय हमारे दल में डुबकी लगाकर पवित्र हो लेंगे।गंगा जी भी साफ़ रहेंगी।इससे हमारी छवि अपने-आप निखर उठेगी।

सुनते हैं कि अतीत में उन्होंने ऐसा बहुत कुछ कहा है जिससे आपको भी कष्ट हुआ।इसे कैसे भूलेंगे ?

अरे कुछ नहीं भाई।राजनीति में भावुक होने की कोई जगह नहीं है।‘डिजिटल’ ज़माने में बस एक ‘डिलीट’ से अपनी और उनकी ‘मेमोरी’ बिलकुल नई हो जाती है।इतनी ‘स्किल’ तो बरखुरदार हमने सीख ली है।दूसरी बात हमारा मानना है कि यदि कोई व्यक्ति बिगड़ा हुआ है तो उसे सुधरने का मौक़ा तब तक देना चाहिए,जब तक वह हमको बिगाड़ न दे।

आप यह सब कैसे कर लेते हैं ? इसके पीछे कौन-सा ‘विज़न’ काम करता है ?

हाँ,पहली बार आपने महत्वपूर्ण सवाल पूछा है।वैसे तो हम किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं पर हमारे दल का लोकतंत्र में पूरा  विश्वास है।हम उसका सम्मान करते हैं।अब आपके सवाल पर आते हैं।देखिए,इस समय निवेश का मुख्य क्षेत्र जनसेवा है।इसी में अकूत सम्भावनाएँ हैं।इसके लिए टेंडर उठते हैं,बोलियाँ लगती हैं।लम्बी ज़ुबान और लम्बी जेब के मालिक जनसेवक बनने के लिए सबसे फ़िट होते हैं।हम तो चाहते हैं कि ‘आईपीएल’ की तरह इसमें भी पारदर्शी-प्रक्रिया हो।बिकने वाले जनसेवक अपने गले में अपनी क़ीमत का टैग लटका लें।जनता भी इसे खुलेआम देखे और गर्व महसूस करे।सारा ‘क्रेडिट’ हमें ही क्यों मिले ? लोकतंत्र में आख़िर जनता ही तो जनार्दन है और ज़िम्मेदार भी।

तभी ‘सेवातुर’ जनसेवक जी आ गए।हमने उनका पक्ष जानना चाहा।उनका सीधा और सपाट उत्तर था-‘हम बोलते नहीं बयान देते हैं।यही हमारी ख़ूबी है।हमारी जनसेवा के जज़्बे से कुछ लोगों को क़ब्ज़ हो गया है।वे नैतिकता जी और संस्कृति जी को बिलावजह  बीच में घसीट रहे हैं।हम दोनों की इज़्ज़त करते हैं इसलिए उनसे कोसों दूर हैं।हम पर कोई आरोप नहीं लगा सकता।हमने कोई अजूबा काम नहीं किया है।बचपन में ग़लती से पढ़ा था ‘आरत काह न करइ कुकरमू’।तब से जब हम कभी भी तकलीफ़ में होते हैं तो स्वतः ‘आर्तनाद’ हो उठता है।‘आरत’ की पुकार सुनकर भगवान को तो आना ही पड़ता है।आप देख रहे हैं,हम उन्हीं की शरण में हैं।’

तभी ‘जनसेवक केंद्र’ का फ़ोन घनघना उठा।कोई और जनसेवक ‘आर्तनाद’ कर रहा था।


©संतोष त्रिवेदी

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

मूर्तियों का मुक्तिकाल और सभ्यता-परिवर्तन !

मूर्तियाँ ख़ुश हैं।वे यकायक सजीव हो उठी हैं।बरसों से घाम और बारिश में जो एक ही मुद्रा में खड़ी थीं, ‘सभ्य-समाज’ के प्रयासों से वे हरकत में आ गई हैं।जीवितों की तरह ही वे टूट रही हैं,गिर रही हैं और एक-दूसरे से ईर्ष्या भी कर रही हैं।आदमी भौंचक है।उसे इतनी जल्दी ‘मानव-विकास क्रम’ के पाषाण-युग में जाने का भरोसा नहीं था।पत्थरबाज़ी से चलकर वह मूर्तिबाजी तक आ गया।मूर्तियाँ आपस में खुसर-पुसर कर रही हैं।वे एकदम से संवेदनशील हो उठी हैं।एक ने दूसरी से पूछा-तू गिरी क्यों ? अच्छी-ख़ासी तो टिकी हुई थी।रोज़ फूल भी चढ़ रहे थे।इतनी भी क्या नाज़ुक हो गई कि फूलों का भार भी नहीं झेल सकी ?

उसने जवाब दिया-मैं तेरी तरह बोझ से नहीं गिरी।बक़ायदा शहीद हुई हूँ।अब मेरा स्मारक बनेगा।फिर से प्राण-प्रतिष्ठा होगी।आदमी अपने जीने के लिए मुझे कभी मरने नहीं देगा।तू अपनी बता,तू कैसे ज़मींदोज़ हुई ? तुझे तो सरकार ने आदमियों से सुरक्षा भी दे रखी थी।दूध से नहाती थी।रोज़ाना अभिषेक होता था।फिर मिट्टी में कैसे मिल गई ?

पहली वाली ने टूटे हुए मुँह से उत्तर दिया-मैं तो सभ्यता के प्रति सदा समर्पित रही हूँ।जब तक टँगी रही,सभ्यता को टाँगे रही।आदमी अब स्वयं सभ्य हो गया है।उसने ख़ुद को टाँग लिया है।वह आत्म-निर्भर होकर स्वयं पत्थर बन गया है।यह मेरी गिरावट नहीं बल्कि मुक्ति का प्रतीक है।कबूतर और कौओं के लिए ज़रूर अफ़सोस है।बीट करने के लिए उन्हें आदमी पर निर्भर होना पड़ेगा।यह नई स्थापनाओं का समय है।मूर्तियाँ खंडित हो रही हैं,मूर्खताएँ स्थापित हो रही हैं।बुत अब बोलने लगे हैं।वैसे भी टूटे हुए मुँह से स्वस्थ विचार कहाँ निकल सकते है ! आदमी के पास अब विचार हैं।वह अब सोचता भी है,भविष्य के प्रति चिंतित भी है।हम भले गिर रहे हैं पर वह उठ रहा है।हम इसी में ख़ुश हैं।

अचानक दोनों मूर्तियाँ ख़ामोश हो गईं।उन्हें आदमियों की पदचाप सुनाई दी।वे नई मूर्तियाँ ला रहे थे।दोनों मूर्तियाँ अब आश्वस्त थीं कि सरकार सक्रिय हो चुकी है।

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

घोटाला ही असल कारोबार है !

कभी प्रिय रहे तुम,

यह ख़त हम दुबई के बुर्ज ख़लीफ़ा की एक सौ आठवीं मंज़िल से लिख रहे हैं।जिस स्याही से लिख रहे हैं,पढ़ लेने के बाद वह भी हमारी तरह उड़ जाएगी।इसलिए तुम इसे सबूत मानने की ग़लती मत करना।यहाँ आने की तुम्हारी कोई कोशिश बेकार जाएगी क्योंकि इससे केवल घोटाले की रक़म और बढ़ेगी।तुम्हें खाते के बजाय ख़त मिल रहा है,यह कम नहीं है।सब जानते हैं कि विशुद्ध व्यापारी लेता है,देता कुछ नहीं।पर मैं अपने देश से प्यार भी करता हूँ।उसी की ख़ातिर अपने सिद्धांत तोड़कर तुम्हें यह जवाब दे रहा हूँ।तुमने हमें निराश किया है।हम पर घोटाले का आरोप लगाते तुम्हारी आत्मा नहीं काँपी ? आत्मीय रिश्तों के बीचअर्थकब घुस गया, जान ही नहीं पाया।फिर देश मेरा,देशवासी मेरे,उनका पैसा मेरा पैसा।इसमें घोटाला बीच में कहाँ से गया ! घोटाला तो तब होता जब हमारे खातों में न्यूनतम बैलेंस होता और हम उसकाचार्ज भर पाते।पर हमारे सभी खाते तो अधिकतम बैलेंस से भरे हुए थे।तुम्हीं संभाल नहीं पाए।अब करोड़ों की भीख हमसे माँग रहे हो,जबकि उलटे तुम्हें इसका हर्ज़ाना हमें देना चाहिए।

तुम्हें नहीं पता,तुमने देश का कितना नुक़सान कर दिया है ! टेलिविज़न से लेकर अख़बार तक तुमने घोटाले का रायता फैला दिया।यहाँ तक कि कल दुबई में लंच के समय जब अख़बार पढ़ रहा था तो उसमें भी फैला हुआ था।बैरा लगातार हमें घूर रहा था।बेचारा बिना टिप लिए ही चला गया।पर मैं तुम्हें टिप ज़रूर दूँगा।तुम्हारी इन हरकतों से हमारी साख़ पर बट्टा लगा है।हम देश के हैं,इसलिए हमारी साख़ भी देश के बट्टे-खाते में।हज़ारों-करोड़ की साख़ तुम्हारी एकचूकसे चुक गई।तुमने देशवासियों के विश्वास और भरम को तोड़ा है।उनके गले में पड़े लाखों के हार पलक झपकते हज़ारों में बदल गए।लोगों ने उनकी जाँच करवा ली।अब पछता रहे हैं।गहने वही,गला वही पर क़ीमत दो कौड़ी की रह गई।असली घोटाला तो यह है।इसके ज़िम्मेदार तुम और तुम्हारा तंत्र है।यह केवल पैसे भर का मामला नहीं है।एक अच्छे-भले ब्रांड की हत्या है।जिसे तुम घोटाला कह रहे हो,वही असल कारोबार है।इसमें और ग्रोथ होता पर तुम्हारी नादानी की वजह से बर्बाद हो गया।शेयर बाज़ार टूट गया।आम आदमी का भरोसा टूटा।हमारी भावनाएँ आहत हुईं,साख़ टूटी सो अलग।इस सबके ज़िम्मेदार तुम्ही तो हो।तुम्हें नोटिस नहीं भेज रहा हूँ,यह हमारी सहृदयता है।

तुमने हम पर जो छापेमारी की,उसको हमनोटिसनहीं लेते।हाँ,इसके पहले अगर तुम हमें नोटिस भेज देते तो तुम्हारा ही भला होता।फागुन का महीना चल रहा है।खातों में थोड़ा अबीर-गुलाल धरवा देते ताकि वे भरे-भरे दिखते।इससे कुछ बरामदगी दर्ज होती और तुम कुछ अपने मुँह की क़ालिख रंगीन कर लेते।हम पर चूना लगाने का जो आरोप लगा रहे हो वह महज़ त्योहारी-सफ़ाई है।चूना पोतने के अलावा अगर कुछ और करते तो जवाबदेह होते ! हम फिर भी जवाब दे रहे हैं।तुम्हारी ढिठाई के बावजूद हम तुम्हें होलिका-दहन की बधाई दे रहे हैं।आओ,हम मिल-जुलकर सारे आर्थिक-पाप इस होली में जला डालें।तुमने भी पढ़ा होगा,भारतीय संस्कृति में आत्मा अमर होती है,पाप नहीं।उन्हें एक दिन नष्ट होना ही है।तुम्हें हो हो,हमें इस मान्यता पर पूरी आस्था है।इसलिए हमारे सभी वादा-पत्रों को होली की पवित्र अग्नि में समर्पित कर दो।सम्बंध पुनः मधुर हो जाएँगे।

और हाँ,तुम्हारे कुछ लोग हमारे धंधे को फ़्रॉड कह रहे हैं,कुछ स्कैम।खातों की तरह इसे भी मैं साफ़ करता हूँ।यह तो फ़्रॉड है, ही स्कैम।इसे उदाहरण देकर समझाता हूँ क्योंकि तुम्हारीसमझदारीअब संदेह से परे है।इतने सालों से यह तुम सबकी नाक के नीचे हुआ।नाक खुली भी थी।इसका सबूत यह कि सभी अब तक जीवित हैं।फ़्रॉड तो चोरी-चोरी अंधेरे में किया जाता है।सो,यह फ़्रॉड क़तई ना है।रही बात स्कैम की,सो वे पिछली सरकार के समय होते थे।यह ख़ुलासा चूँकि इस सरकार के समय हुआ है,इसलिए स्कैम नहीं हैज।किसी मंत्री का इस्तीफ़ा भी नहीं आया,इसलिए भी यह स्कैम नहीं हो सकता।दरअसल,यह आँकड़ों की ग़लतफ़हमी भर है।इसे हम यूँ ही एकमेलसे दूर कर सकते थे पर तुमने वह मौक़ा भी गँवा दिया।पहले के कई मेल-मिलाप ही याद कर लेते।पर यह सब नहीं हुआ।अब तुम पर हमारी कोई देनदारी नहीं बनती।हमने अपने वक़ील से भी पूछ लिया है।तुम चाहो तो हमारे पुराने फ़ॉर्म हाउस से पुदीना उखाड़ सकते हो ! हम नोटिस भी नहीं भेजेंगे।

तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारे इस क़दम से कितने लोग बेरोज़गार हुए हैं ! उन सबकी बद्दुआएँ तुम पर ज़रूर बरपेंगी।हम तो इंटरनेशनल व्यापारी ठहरे।धंधा बदल जाएगा,पर ठहरेगा नहीं।हीरा है सदा के लिएयूँ ही नहीं कहा गया है।हम इसका ईमानदारी से पालन भी करते हैं।हीरा कभी कोयला बनकर राख नहीं होता।कटकर और क़ीमती हो जाता है।तुम हमारी साख़ में जितनी भी क़ालिख पोत रहे हो,हम उसे फागुन-इफ़ेक्ट मानकर माफ़ करते हैं।होली के रंगों के साथ यह भी उतर जाएगा।

रही बात देश में आने की,तो तुमने इतनीचरस बो दीहै कि हम उसकी फ़सल देश के बाहर से ही काट रहे हैं।फ़िलहाल,हम तुम्हें पान-बीड़ी और सुरती के ख़र्चे का नोटिस नहीं दे रहे हैं,यह हमारी ओर से तुम्हेंहोली-गिफ़्टहै !

तुम्हारा अब नहीं 

हीरा सुनार