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रविवार, 19 मार्च 2017

हारे हुए नेताजी से एक्सक्लूसिव बातचीत !

चुनाव ख़त्म हो चुके थे।सब जगह हार-जीत का पोस्टमार्टम चल रहा था।ऐसे में एक जागरूक पत्रकार होने के नाते हमने भी अपनी ज़िम्मेदारी समझी।सोचा,जीतने वाले नेताजी का इण्टरव्यू ले लिया जाय।मौक़ा भी था और दस्तूर भी।निजी सम्पर्कों से पता किया तो मालूम हुआ कि उनके पास 2019 के पहले तक की डेट ही नहीं है।हमें इस समस्या का विकल्प भी मिल गया।हम चुनाव हारने वाले नेताजी से मिलने चल दिए।इसके लिए उनसे समय माँगने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी।उनकी बहुमूल्य काया के पास ले-दे के यही एक चीज़ इस चुनाव बाद बची थी।चुनावी-मशीन से निकले मतों ने उनका सारा 'काम' तमाम कर दिया था।उनकी विज्ञापनी-उपलब्धियाँ हवा में बाइज़्ज़त उड़ गईं थीं।नेताजी की हार ऐतिहासिक थी,इस लिहाज़ से उनसे इंटरव्यू लेना भी छोटी उपलब्धि नहीं थी।

हम उनके ठिकाने पर पहुँच गए।नेताजी खाट बिछाए बैठे हुए थे।एकदम ख़ाली थे।हमें देखकर उनकी जान में जान आई।अभिवादन के बाद हमने सभी ग़ैर-ज़रूरी सवाल किए।उन्होंने भी उनके अप्रत्याशित जवाब दिए।पूरे समय हार को मजबूती से गले से लगाए बैठे रहे।नेताजी के साथ हुआ संवाद अविकल रूप से यहाँ प्रस्तुत है :

सवाल : चुनावों में आप की खटिया खड़ी हो गई फिर भी आप इतने भरोसे के साथ बैठे हुए हैं।आख़िर इसका राज क्या है ?

जवाब :देखिए,राज तो हमारे पास नहीं रहा,पर राज की बात तो बता ही सकता हूँ।यही कि उनकी जीत अब राज नहीं रही।यह हम आगे बताएँगे।इस चुनाव में हमारी खटिया खड़ी करने की भरपूर कोशिश की गई पर हम टस से मस नहीं हुए।यह खटिया हमारे परिवार का हिस्सा रही है और आगे भी खड़ी रहेगी।हमारे राज में यह समाजवाद की गवाह रही है।यही कारण है कि अब तक हमारे परिवार में समाजवाद बचा हुआ है।हम लड़ते-झगड़ते और लूटते-लुटते एक साथ हैं।हमें ख़ुशी है कि चुनाव में आत्मसम्मान बचाने में हम सफल रहे।हारकर भी हम जीते हैं क्योंकि यह लड़ाई हारने के लिए ही हम लड़ रहे थे।इसकी प्रक्रिया हमने चुनाव से काफ़ी पहले शुरू कर दी थी।हमें संतोष है कि हमारी लड़ाई पूरी तरह पारदर्शी रही।

सवाल:यह सब आपने संभव कैसे किया ? क्या आपने हारने के लिए ही गठबंधन किया था ?

जवाब:यह बहुत ज़रूरी सवाल पूछा है आपने।दरअसल हमने हारकर अपनी एकजुटता साबित की है।हम अपने गठबंधन के सहित समान-भाव और समान स्ट्राइक रेट से हारे हैं।हमारे हार जाने से परिवार में एकता बरक़रार है।हम शुरू से ही हार जाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे।जीत जाने पर 'मुलायम' बन जाने की आशंका थी।गठबंधन हमारे लिए हमेशा की मजबूरी बन जाता।अब हम भी मुक्त हैं और वो भी।इसीलिए हम जानबूझकर नहीं जीते।लगातार जीत पार्टी के लिए नुक़सानदेह साबित होती।हमारे सभी कार्यकर्ताओं को 'हार' पसंद है।इसीलिए हमें ये 'साथ' पसंद था। सरकार में रहकर हमारे 'हल्ला-बोल' प्रोग्राम में थोड़ा मुश्किल हो रही थी।हार ने इसे आसान बना दिया है।हम अपने प्रदर्शन से क़तई ख़ुश हैं।

सवाल:आपने यह महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कैसे की ? इसका श्रेय आप किसे देते हैं ?

ज़वाब :सारा श्रेय हमारे काम को जाता है।पूरे पाँच साल काम बोलता रहा पर आख़िरी समय में टें बोल गया।इसमें विरोधियों की भूमिका रही।यही वजह रही कि चुनावों के दौरान हमारे 'काम' को फ़रार होना पड़ा।उन्होंने भरे चुनाव में उसे पटरी से उतार दिया।हमारे मजबूत काम को बिजली का करंट मारा।हाईवे और सड़कें हमने बनवाईं ताकि लोग उन पर चलकर मतदान-केंद्र तक हमें हराने के लिए आ सकें। रोड हमारी थी पर शो 'उनका' हुआ।हारने में कोई कसर न बाक़ी रहे,इसके लिए हमने मिली-जुली रैलियाँ की।परिणाम गवाह हैं कि उन जगहों में हम ज़मानत-ज़ब्त कर बाइज़्ज़त हारे।हमारे अफ़सरों ने भी इसमें बख़ूबी हमारा साथ दिया।मौक़ा पाते ही वोटिंग मशीनों में हवा भर दी।फागुन का फ़ायदा उठाकर मशीनों से सफलतापूर्वक छेड़छाड़ भी की गई।इससे मतगणना के समय सारी मशीनें बौरा गईं।मौसम ने भी हमसे साज़िश की।बसंत में फूल उनका खिला और पत्ते हमारे झड़ गए।
सवाल : अब आगे की आपकी कार्ययोजना क्या है ?

उत्तर:कुछ नहीं।बस हम जनता को अपनी हार से होने वाले फ़ायदे गिनाएँगे।पूरे पाँच साल हार की ऐसी माला जपेंगे कि विरोधी ख़ुद-ब-ख़ुद हार माँगने लगेंगे।लेकिन इतनी आसानी से इस 'अमर-मंत्र' को हम उन्हें नहीं देंगे।पिछले पाँच सालों में हमने विकास का जो खनन किया है,उसी से वे रेत के महल बनाएँगे।

सवाल: इस हार से जनता को क्या संदेश देना चाहेंगे ?

ज़वाब : हम तो हारे हैं जी।जो भी देना होगा,जीतने वाले देंगे।अब तो नई सरकार से हमारी माँग है कि उन्होंने जो वादा किया था कि सभी किसानों का क़र्ज़ माफ़ कर देंगे,उसे जल्द पूरा करें।हम तो बेसिकली किसान ही हैं।हमारा सारा क़र्ज़ा माफ़ किया जाय।नोटबंदी और वोटबंदी से हुए नुक़सान की भरपाई की जाय।'मनरेगा' के तहत बुलेट ट्रेन का टेंडर भी हमें दिया जाय।हारने के बाद इतना हक़ तो हमारा भी बनता है।

बुधवार, 1 मार्च 2017

व्यवस्था का शिकार आम आदमी

साहित्य में आज सबसे ज्यादा मारामारी है तो व्यंग्य में ही है ।जो नए हैं वो छपना चाहते हैं,जो नामचीन हैं वो कॉन्ट्रैक्ट पर रेगुलर होना चाहते हैं।व्यंग्य लिखकर साहित्य की मुख्य-धारा में कूदना सबसे आसान लगता है।यह प्रसिद्धि का शॉर्टकट बन गया है।नई पीढ़ी की अधिकांश संभावनाएँ इसी में आत्ममुग्ध हैं।इस मामले में वे अपने समकालीन वरिष्ठों के सच्चे अनुयायी हैं।नई पीढ़ी सीधे-सपाट लिखे संस्मरण को,चुटीली किस्सागोई को,चलताऊ मुहावरेबाजी को ही व्यंग्य समझ रही है।वह केवल शब्दों के साथ खेल को ही व्यंग्य मान रही है।भाषा तो पठनीय हो ही,पर यदि उसमें तंज का हथौड़ा नहीं है तो वह अपने शिकार को तोड़ने में समर्थ नहीं।व्यंग्य आपके डीएनए में होता है।इसे आप 'स्किल-इंडिया' प्रोग्राम के तहत डेवलप नहीं कर सकते।

नई पीढ़ी में उँगलियों में गिने जाने वाले जो कुछेक नाम हैं,उनमें मलय जैन ऐसे हैं जो संभावना से आगे बढ़ चुके हैं।उनका उपन्यास 'ढाक के तीन पात' इसकी मज़बूत गवाही देता है।उपन्यास का कथानक ग्रामीण पृष्ठभूमि पर है,जो आधुनिकता की चपेट से वंचित नहीं है।शहर से दूर 'गूगल' गाँव तमाम तकनीकी सुधारों और विकास की भीषण आँधी के बीच अपनी पारंपरिकता बचाए हुए है।इसका प्रत्यक्ष प्रमाण लेखक की शाब्दिक आँखों से ही देखिए,

'आपके स्वागत को आतुर शौचरत स्त्री,पुरुषों और ब्च्चों की क़तारें,बेतरतीबी से बने कच्चे और कुछ पक्के मकान,मकानों के बीचोंबीच गलियाँ और उन पर बहती नालियाँ...इन्हीं गलियों में घूमते कुत्ते....नालियों में गालियाँ खाकर उन्मुक्त स्नान करते सुअर....गाँव से दो-दो कोस दूर पानी भरने जाती गोरियाँ....'

इसी गाँव में सरकारी योजनाओं के लागू होने को लेकर कमिश्नर साहिबा के दौरे पर पूरा कथानक केंद्रित है।अधिकतर पात्र अपने नाम के अनुरूप ही आचरण करते हैं।गोटीराम जहाँ गोटियां बिछाने में माहिर हैं,वहीं लपका सिंह गाँव की हर वास्तविक और संभावित घटना को सबसे पहले लपकते हैं।वैद्य जी सबका इलाज करने से पहले अपने बुढ़ाते काम-पराक्रम की दवा गुलबिया बाई के ज़रिए ढूँढ लेते हैं पर बाद में वही दवा उनके निजी जीवन में रिऐक्शन कर जाती है।
पुलिस का एक शब्द चित्र देखें:

"पुलिस के दारोग़ाओं की धज देखते ही बनती थी।ऊँचा पूरा बाँका बदन,भारी भरकम डील-डौल ,तोंद ऐसी कि उसके पीछे बाक़ी शरीर छिप जाए।इलाक़े में दरोग़ा जी बाद में पहुँचते थे,पहले तोंद पहुँच जाती थी।बल्कि तोंद की आमद होते ही इलाक़े में सन्नाटा छा जाता था कि लो तोंद तो आ गई,दरोग़ा जी भी आते होंगे।"
राजनीति में धर्म और जाति के ज़रूरी दख़ल पर व्यंग्यकार की क़लम यूँ चलती है,"प्रजातंत्र ने देश को मुख़्तलिफ़ दल दिए थे और दलों ने गमछे ।शेष हिंदुस्तानी गाँवों की तरह गूगल गाँव में भी गले- गले में गमछा था।कोई पीला तो कोई नीला,कोई तिरंगा तो कोई बहुरंगा।हर गमछे के रंग को देखकर दूर से यह अन्दाज़ लगाया जा सकता था कि अमुक के शरीर में कौन- से राजनीतिक दल के कीटाणु प्रविष्ट हैं !" ऐसा कहते हुए लेखक की भाषा बिलकुल सहज और चुटीली लगती है।

अंधविश्वास की मज़बूती बताती है कि इसका अशिक्षा से कोई सीधा सम्बंध नहीं है।क्या गाँव वाले,क्या शहर वाले,अभी जब हर तरफ़ से निराश हो जाते हैं तो उनके लिए एकमात्र उम्मीद 'दनादन' बाबा में ही नज़र आती है।यह शब्दचित्र देखें:

'ऐसा आम तौर पर प्रचारित था कि एक दनादन बाबा ही हैं ,जिनकी लातें गूगल गाँव को तमाम विघ्न-बाधाओं से बचाए हुए हैं।लातों की यह ख्याति केवल गूगल गाँव तक नहीं थी,वरन दूर-दूर के क़स्बों और शहरों तक पहुँच चुकी थी।इस ख्याति के अनुसार दनादन बाबा की लात हर मर्ज़ की दवा थी।जो हारी- बीमारी तमाम दवाओं और मँहगे अस्पतालों के बूते की बात न थी,उसका इलाज दनादन बाबा की लात थी।जिस कोख को हरी करने में अनिवार्य अंग थक-हारकर अधमरी हालत में चले गए हों,वहाँ कामयाबी का एकमात्र नुस्ख़ा दनादन बाबा की चमत्कारी लात थी।भूतों-प्रेतों की छाया हो या साढ़ेसाती का चक्कर,इन सबसे निज़ात के लिए ग्रह-नक्षत्रों की शांति नहीं,दनादन बाबा की लात काफ़ी थी।'

सरकारी योजनाएँ अव्वल तो काग़ज़ों से उतरकर ज़मीन पर आती ही नहीं,अगर आईं भी तो उनका क्रियान्वयन करने के बजाय क्रियाकर्म कर दिया जाता है।सरकारी स्कूल के लिए 'दोपहर का भोजन' योजना अफ़सरों,कर्मचारियों के लिए मौक़े की तरह आया है।गाँव में एक आम आदमी कैसे अपनी रोज़ाना  ज़िंदगी में जद्दोजहद करता है उसकी एक बानगी:
'शौचालय की तो छोड़ो,इन बेवक़ूफ़ देहातियों के घरों में ढंग का एक ग़ुसलखाना भी नहीं था।कलेक्टर साहब ने गाँव में देखा था,प्रायः हर घर में पन्नियों,टाट और लकड़ी के फट्टों का इस्तेमाल कर उन्हें गुसलखाने का रूप दे दिया गया था।कबाड़ का उपयोग तो कोई इन मूर्ख गाँव वालों से सीखे।टाट और फट्टों की बस चार फ़ुट ऊँची दीवारें ......ताकि हर कोई रास्ता चलता ताककर या झाँककर इस बात की तसदीक़ कर सके कि इसके भीतर जो भी शख़्स है वह उसी हालत में पाया जा रहा है या नहीं,जैसा कि हमाम में पाया जाना चाहिए ...'हुँह ' उन्होंने सोचते हुए मुँह बिचकाया।'स्साले देहाती खेती करेंगे ट्रैक्टर हार्वेस्टर से और हगने जाएँगे सड़कों पर।'

मलय जैन का भाषा-पक्ष मज़बूत है।समृद्ध होने के बावजूद उनकी भाषा पठनीयता के आड़े नहीं आती।भाषा का पूर्णतः विशुद्ध होना जैसी बंदिश से लेखक प्रभावित नहीं है।वह आम बोलचाल और देशज भाषा के साथ-साथ हिंगलिश शब्दों को भी अपनी रचना-यात्रा में स्वाभाविक रूप से आने देता है।यह उपन्यास विकास के दौर में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की तरह है।ऐसे कथानक का समय चालीसेक साल पहले का होना चाहिए था पर अपने अगल-बग़ल देखने पर ऐसा लगता है कि यह वर्तमान समय की सीधी कमेंट्री है।आम आदमी आज भी किसी समस्या के बजाय व्यवस्था और अफ़सरशाही का शिकार है।दरअसल उसकी मुख्य समस्या व्यवस्था ही है जिसे उसकी सेहत में सुधार के लिए लाया गया बताते हैं।आज़ादी के बाद ख़ुशहाली की चाह 'ढाक के तीन पात' बनकर रह गयी है।इस नाते मलय जैन अपनी बात को बड़ी सुरूचिपूर्ण तरीक़े और स्पष्टता से कह जाते हैं,जिसमें हमें कभी हँसी,कभी विषाद और अंततः करुणा का अनुभव होता है।

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

परसाईं-प्रेमी से मुलाक़ात !

वे परसाईं जी के सबसे बड़े प्रेमी हैं और परसाईं-प्रसाद बाँटने वाले इकलौते वितरक भी।जब भी वक्तव्य देते हैं,परसाईं से नीचे नहीं उतरते।आशय यह कि परसाईं पूरी तरह उनके मुँह लग चुके हैं।इस बात को वे कई बार साबित भी कर चुके हैं।उनके पास परसाईं के हाथ की लिखी एक चिट हमने भी देखी है।वे उसे हमेशा अपने पास रखते हैं।जब भी किसी विमर्श में हल्के पड़ने लगते हैं,चिट आगे कर देते हैं।इससे उनके विरोधी चित्त हो जाते हैं।परसाईं के नाम से शहर में जितनी गोष्ठियाँ होती हैं,उनके व्याख्यान की गठरी तैयार रहती है।वे बस इत्ता करते हैं कि नियत समय पर जाकर वही गठरी श्रोताओं के सामने पटक देते हैं।श्रोता पहले से ही अधमरे होते हैं।कोई प्रतिकार नहीं कर पाते।श्रद्धाभाव से उनसे धुल लेने में ही भलाई समझते हैं।उनके पास परसाईं नाम की ऐसी अचूक मिसाइल है,जिससे वह कोई भी सभा ध्वस्त कर देते हैं।

इस बार सभा से पहले हमें उनके दर्शन करने का सौभाग्य मिल गया।समकालीन व्यंग्य-लेखकों का एक गैंग पहले से ही उनको घेरे में लिए हुए था।हमें परसाईं तक पहुँचना था,इसलिए उनसे मिलना ज़रूरी था।किसी तरह उनके बनाए चक्रव्यूह को भेदकर हम उनके चरणों तक पहुँच गए।उस समय भी वे पारम्परिक परसाईं-मुद्रा में बैठे थे।नई पीढ़ी के होनहारों को तीस साल पहले का एक संस्मरण सुना रहे थे।हमें देखते ही उनका आशीर्वादी-हस्त स्वतः उठ गया।हमने भी माहौल की नजाकत समझते हुए अपने नाकारा कर उनके चरणों में समर्पित कर दिए।

वे मुस्कुराने लगे।हमने उनकी मुस्कराहट को साहित्यिक-प्रेम समझकर आत्मसात कर लिया।उस समय हमारे पास और कोई चारा नहीं था और न ही आसपास दूसरा वरिष्ठ कि इसका बुरा मानता।हमें अपने कब्जे में पाते ही वे शुरू हो गए-तुमसे बड़ी निराशा हुई है।नई पीढ़ी इसी तरह करती रही तो व्यंग्य की दशा स्थिर ही रहनी है।तुम लोग न किसी को पढ़ते हो और न व्यंग्य समझते हो।ऐसा कब तक चलेगा ? ज्यादा दिनों तक मैं इंतज़ार नहीं कर सकता।इतना सुनते ही हमें होश लौट आया।पूछा-गुरुदेव,हम निरंतर परसाईं को पढ़ते हैं।उन्हें समझ भी रहे हैं,फिर भी कोई चूक रह गई हो तो मार्गदर्शन करें।'

अब वे मुखर हो चुके थे।तुम लोग घुइयाँ लिखते-पढ़ते हो।परसाईं के बाद तुम्हें कुछ दिखता ही नहीं ! वे तो लिखकर चले गए और उन्हें समझने,समझाने की जिम्मेदारी हमने बकायदा निभा भी ली।अब हमें समझो और आगे दूसरों को समझाओ।आखिर हम परसाईं के बारे में तुम्हें समझा रहे हैं ना ? 'पर गुरुदेव,परसाईं के लेखन और आचरण का सिलेबस एक ही था।इसलिए उन्हें समझने में आसानी है।हमने  तो उन्हें पढ़कर अबतक यही समझा है।

'तुम परसाईं को जानते हो या मैं ?पिछले कई सालों से उन पर हजारों व्याख्यान दे चुका हूँ।मेरी मजबूत पकड़ है।परसाईं को नहीं छोड़ा तो तुम किस खेत की जड़ हो ? लिखता तो मैं भी निरंतर हूँ।रही बात आचरण की,इसके लिए किसी आह्वान की ज़रूरत नहीं,वे मेरे पास भी हैं।अभी-अभी तुमने छुए भी हैं।दरअसल,दिक्कत तुम्हारी नहीं,इस पीढ़ी की है।इसके पास न विचार हैं न शिष्टाचार।विचार नहीं तो कोई बात नहीं।हमने भी तो इत्ते साल यूँ ही काट दिए।पर वत्स,शिष्टाचार मत भूलो।हमारी उमर हो रही है।ऊपर जाकर परसाईं जी को क्या मुँह दिखाऊंगा ! हमसे यही कहेंगे कि हमने उन्हें बार-बार याद करके उनका स्वर्ग में जीना हराम किया ही,हमारी नई पीढ़ी भी यही कायरता दिखा रही है।इसलिए कह रहा हूँ कि तुम लोग अब आगे बढ़ो और हमें उठा लो।कल ही हमारी फलाने वरिष्ठ से टेलीफोन पर बात हो रही थी।दो मिनट की वार्ता में हम दोनों इस निष्कर्ष पर पहुँच गए कि नई पीढ़ी से कोई उम्मीद नहीं।यह तो अच्छा हुआ कि परसाईं के बाद हम लोगों ने उन्हें उठा लिया।पर यह उठावनी यहीं रुकनी नहीं चाहिए।तुम लोग अपने हाथ और कंधे मजबूत रखो।कभी भी किसी को स्वर्णिम अवसर मिल सकता है।उसी के नाम अगला इतिहास होगा।'उनके अन्दर का भरा पड़ा साहित्यकार आखिर फूट ही गया।


हमने धीमे से भी प्रतिवाद नहीं किया।मन ही मन में कहने लगा-पिछले कुछ समय से हमें भी अब अहसास हो रहा है कि हम जड़ हैं।जहाँ पाँच साल पहले खड़े थे,आज भी वहीँ है।यहाँ तक कि गोष्ठी में एक छोटी -सी जगह भी नहीं घेर पाए।क्या करें,लिखने से अधिक समय समझने में जाया हो जाता है।जिसको समझने लगता हूँ,वह हमें ग़लत साबित कर देता है।हमें फिर से पूरा होमवर्क करना पड़ता है।आज भी व्यक्ति और प्रवृत्ति को समझने में असमर्थ हूँ।इसीलिए यहाँ आया था।अब जा रहा हूँ।'

मुलाकाती-समय समाप्त हो चुका था।हमारी दुविधा और बढ़ गई थी।हमें अब व्यंग्य की नहीं अपनी चिंता सताने लगी थी।

इस बीच हमने उनके गैंग की ओर देखा।वे सब मंच की व्यवस्था में जुट चुके थे।वहीँ से थोड़ी देर में आदरणीय को परसाईं-स्मृति व्याख्यान पर बोलना था।हमने उन्हें आखिरी बार नज़र भर के देखा।साहित्य के एक बड़े मौके से हम हाथ धो चुके थे।एक बड़े अपराध-बोध के साथ हम गोष्ठी-स्थल के बाहर निकल आए।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

चुनावी हरियाली और छुट्टा साँड़ !

उनका टिकट फिर कट गया है।इस बार पूरी उम्मीद थी कि जनता की सेवा करने का टिकट उन्हें ही मिलेगा।पर नहीं मिला।इस अन्याय पर वे फूट-फूटकर रोने लगे।उनके सब्र का बाँध ढह गया।इससे ऐसी बाढ़ मची कि वे बहकर दूसरे दल तक पहुँच गए।दूसरे दल वाले ने अपने पुराने और जमे हुए प्रत्याशी को ज़ोर का धक्का दिया।वह समर्पित-टाइप का था पर दल को अब उसके समर्पण की नहीं तर्पण की ज़रूरत थी।उसको मुक्ति मिली और दल को नई शक्ति।इस नवल ऊर्जा को नए दल ने सर पर बिठा लिया।इस तरह उन्हें सेवा करने का लाइसेन्स मिल गया।आँसू काम आ गए।सेवा के लिए ख़ून नहीं बहाना पड़ा।यह उनकी समझदारी का परिचायक है।दिमाग़ से लिया फ़ैसला ऐसे ही होता है।टिकट पाने के लिए वो बंधनमुक्त हो जाते हैं,कहीं भी बह सकते हैं।फ़िलहाल वे चुनावी-हवा में बह रहे हैं।

दूसरे दल ने उन्हें तुरंत लपककर बड़ा पुण्य-कार्य किया है।वे अभी तक नख-शिख भ्रष्टाचार की गंगा में डूबे हुए थे।हर तरह के पाप उनके सिर पर थे।उनकी काया भले ही मलिन हो गई हो,पर अंतरात्मा बिलकुल बेदाग़ है।उसी ने आवाज़ दी और वो नए घर में शिफ़्ट हो गए।वैसे भी कोई कहाँ ज़िंदगी भर एक घर में टिकता है ! सेवा करने के लिए पैदाइशी घर छोड़ना ही पड़ता है।नए घर में आते ही उनका परकाया-प्रवेश पूर्ण हुआ।कपड़े बदलने भर से जब कोई साधु बन जाता है तो दल और दिल बदलकर जनसेवक क्यों नहीं बना जा सकता ? इसी दिन के लिए तो उन्होंने बरसों भूख और प्यास सही।लोगों के ताने सुने।अब ऐसे सुहाने मौसम में भी वो न बहें तो कब बहेंगे ! चुनावी-मौसम में सब बह रहे हैं।जहाँ भी टिकट की मनुहार के साथ थोड़ा प्यार मिल जाता है,जनसेवक वहीं टिक जाता है।जिनको ऐसी हरियाली में भी मुँह मारने को नहीं मिलता,वे छुट्टा साँड़ हो जाते हैं।हर जगह मुँह मारते हैं।

डिजिटल इंडिया में जनसेवा का यह आधुनिक संस्करण है।समझदार लोग अपने को जल्दी अपडेट कर लेते हैं।जिनके टिकट कटते हैं,भगवान उनके हाथ-पैर पहले ही मज़बूत कर देता है।हाथ विरोधी से टिकट झपटता है और पैर दल-दल में टहलता है।वह सबको साधने की कला जानता है।ऐसा साधक ही कलिकाल में लम्बे समय तक कुर्सी पर टिकता है।

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

बस एक सम्मान का सवाल है !

लंबे इंतज़ार के बाद अंततः इस साल का साहित्य-भूषण सम्मान घोषित हो गया।साहित्य सेवक जी भारी सदमे में हैं।इस बार भी वे थोड़े अंतर से चूक गए।उनको लग रहा है कि सम्मान-प्रदाता कमेटी में उनका कोई ख़ास शुभचिंतक ज़रूर है,जो उनकी कटिया को मेन-लाइन से जुड़ने नहीं दे रहा है।सम्मान का करंट पाने को वे इतने कटिबद्ध रहे हैं कि उन्होंने अब तक केवल कटिप्रदेश प्रधान रचनाएँ ही लिखी हैं।फिर भी कमेटी के कुछ सदस्यों की आँखों पर पट्टी बँधी हुई है।इसका पहला नुक़सान तो हिन्दी साहित्य को ही हुआ,जो इतनी बड़ी संभावना से वंचित हो गया।दूसरा और महत्वपूर्ण यह कि सम्मान-समिति के वरिष्ठ सदस्य उनके लेखन की गहराई में बहुत अंदर तक डूब गए और इस तरह उनका सम्मान भी।

साहित्य-सेवक जी को मलाल इस बात का है कि साहित्य-भूषण न्योछावर करने वाली संस्था में उनकी अच्छी घुसपैठ के बावजूद उनसे कनिष्ठ साहित्य-द्रोही बाजी कैसे मार सकता है ! इससे उनको गहरा साहित्याघात लगा है।फलस्वरूप उसकी रचना को वे दैनिक रूप से पटक रहे हैं।उनका पक्ष है कि सिफारिश में भी अनुभव को प्राथमिकता मिलनी चाहिए पर संस्था ने इसकी अनदेखी कर परंपरा तोड़ी है।यह साहित्यिक-इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा घपला है।साहित्य-सेवक जी इसीलिए आजकल घपलों का नाम आते ही भड़क उठते हैं।उनका मानना है कि सम्मान संभालने के लिए भी एक शऊर और सलीक़ा होना चाहिए,जो उनके पास बरसों से धरा हुआ है।


उनके साथ हुए इस साहित्यिक घात का विरोध पूर्व में चूके कई सम्मान-पिपासुओं ने भी किया है।उनका मानना है कि ऐसी मौलिक और मालिशयुक्त प्रतिभा के साथ हो रहे अन्याय से साहित्य की अपूरणीय क्षति हो रही है।इससे तो प्रशस्ति-पत्र इकट्ठा करने वाले वरिष्ठों का सम्मान-संग्रहालय एकदम सूना हो जाएगा।यदि केवल लिखकर सम्मानित होने की परंपरा चल निकली तो सम्मान-संस्थाओं की क़ाबिलियत पर प्रश्न-चिह्न ही लग जाएगा।जिस साहित्य में घुसपैठ करके एकाध नारियल और शाल दबोचने की गुंजाइश न हो,वो साहित्य न लेखकसेवी है और न ही समाजसेवी।साहित्य को समाज का दर्पण यूँ ही नहीं बताया गया है।अब सम्मानरहित लटका हुआ मुँह लेकर लेखक उस दर्पण में कैसे झाँके ! इससे साहित्य की ही बदनामी होगी।


जब से साहित्य-सेवक जी इस सम्मान से चूके हैं,बिलकुल कांतिहीन हो चुके हैं।अपने सम्पर्कों को फिर से टटोलने लगे हैं।कोई तो है जो उनके पास बैठकर उनके ही मान-पथ पर काँटे बिछा रहा है।पिछले काफ़ी समय से वे इस सम्मान पर टकटकी लगाए हुए थे पर सब व्यर्थ रहा।सम्मान-कस्तूरी पाने के लिए वे अंडमान-निकोबार तक न केवल दौड़ सकते हैं बल्कि इस इवेंट में सेल्फ़-फ़ाइनैन्स-स्कीम के तहत इंवेस्टमेंट भी कर सकते हैं।यह संस्था की बदनसीबी है कि उसने सही जगह पर टॉर्च नहीं मारी।और न ही किसी सुपारी-समीक्षक ने उन पर समुचित प्रकाश डाला।लेकिन इस बात से कई साहित्य-रंजक इत्तेफाक नहीं रखते।वे इसका अंदरूनी कारण कुछ और बताते हैं।उनका कहना है कि साहित्य-सेवक जी पर टॉर्च न मारने की बात एकदम गलत है।दरअसल,उनके टॉर्च की बैटरी ही कमजोर थी।ऐसे में नई व चकमक-बैटरी बाजी मार ले गई।लब्बो-लुबाब यह कि समुचित सम्मान पाने के लिए साहित्य-सेवक जी या तो अपनी टॉर्च बदलें या उसे चमत्कारिक बैटरी से चार्ज करवा लें।तभी सम्मान में लगी साढ़ेसाती से मुक्ति मिलेगी।

सम्मान के प्रति उनके इस समर्पण को देखकर कई अन्य साहित्यसेवी घोर अवसाद में चले गए हैं।उनके जैसी ऊर्जा और मज़बूत इरादे का स्तर बनाए रखने में अपने को असहाय पा रहे हैं।इसके लिए कुछ लोग 'सम्मानातुर-संघ' बनाकर अपनी दावेदारी बनाए रखना चाहते हैं।यह संस्था हर वर्ष अपनी वरिष्ठता-सूची को अपडेट करती रहेगी।इसमें सदस्य होने की पात्रता केवल उन्हीं की होगी जो गली-मोहल्ले के सम्मान बटोरकर भी प्रादेशिक या राष्ट्रीय सम्मान से अभी तक वंचित हैं।इस सम्मान-भूख को मिटाने के लिए संस्था के सभी सदस्य मर-मिटने के लिए तैयार हैं।इसके लिए वे सामूहिक रूप से भूख-हड़ताल पर जा सकते हैं।कम से कम एकाध सम्मान तो उनके पास भी ऐसा हो,जिसे वापस कर वे भी मौक़े पर चौका जड़ सकें।


इस बीच साहित्य भूषण धारी लेखक से जब सम्पर्क किया गया तो उन्होंने इस फ़ैसले पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।उनका साफ मानना है कि उनके मुँह में सम्मान लग चुका है और वे अब सम्मान-रहित लोगों के मुँह नहीं लगना चाहते।सम्मानों की वज़ह से वे लिखने के लिए समय खैंच नहीं पा रहे थे,अब आए दिन ऐसी असाहित्यिक अफ़वाहें सुन-सुनकर उनके कान भी पिराने लगे हैं।सुना है कि इस ख़बर से साहित्य-सेवक जी और उखड़ गए हैं।वे अब शिल्प तोड़ने वाली नई रचना पर हथौड़ा लेकर जुटे हैं।