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रविवार, 6 अगस्त 2017

काश,हम भी आलसी होते !

हाल ही में एक निष्कर्ष सामने आया है कि हम भारतीय बड़े आलसी होते हैं।इस अनोखी उपलब्धि की जानकारी हमें तो बहुत पहले से थी,पर दुनिया ने अब जाकर हमारा लोहा माना है।हम मानते हैं कि आलस्य का अपना सौंदर्य होता है।इस बारे में वे बेचारे नहीं जान सकते,जिन्हें इसका कभी सुख नहीं मिला हो।हम तो बचपन से ही आलसी बनना चाहते थे पर कबीर साहब ने ऐन वक़्त पर हमें रोक दिया।स्कूल में हिन्दी के मास्टर साहब ने बताया कि कबीर कहते हैं कि जो काम कल करना हो,उसे आज करो।और जो आज करना हो,वह अभी।संस्कृत वाले आचार्य जी ने तो आलसी होने के तमाम फलित भी बता डाले थे ;`अलसस्य कुतो विद्या,अविद्यस्य कुतो धनं,अधनस्य कुतो मित्रं,अमित्रस्य कुतो सुखं'अर्थात् आलसी को विद्या नहीं मिल सकती।बिना विद्या के धन नहीं,बिना धन के मित्र नहीं और बिना मित्र के सुख नहीं।ये हमले दरअसल आलस्य पर नहीं सीधे हमारी अंतरात्मा पर हुए।इसके बाद हमने कोई और आवाज नहीं सुनी।बस इन्हीं उपयोगी सूत्रों के चक्कर में अपनी संभावित प्रगति बाधित कर डाली।सुख की कामना में आलस्य के स्थायी शत्रु बन बैठे।और आज हाल यह कि सुख हमारा स्थायी दुश्मन बन गया है।आलसी जहाँ रात में भरपूर नींद के बाद दिन में भी अलसाने का सुख उठा लेते हैं,हम रात भर जागते और दिन भर भागते रहते हैं।अनिद्रा के शिकार हो गए हैं क़सम से।

एक कट्टर आलसी को तो हमने इन्हीं जागती आँखों से फलते-फूलते देखा है।मेरे साथ ही गाँव के हाईस्कूल में पढ़ता था।आलस्य से पंगा लेकर मैंने लालटेन जला-जलाकर पूरे साल पढ़ाई की और स्कूल में अव्वल आया था।वहीं हमारे लंगोटिया यार को पढ़ाई से ज़्यादा आलस्य से प्यार हो गया।इतना कि ऐन इम्तिहान के दिन वह निद्रादेवी की गोद में सशरीर समा गया था।उसकी डेस्क को इसके लिए उस दिन भारी शर्मिंदगी उठानी पड़ी।इस घटना का तात्कालिक असर यह हुआ कि उसके ठेकेदार पिता ने पढ़ाई जैसे नीरस और अनुपजाऊ काम से उसे तुरंत खींच लिया।थोड़े दिन बाद ही उसके पिता स्थानीय जनता के दुःख-दर्द बाँटने के कार्यक्रम में लग गए।जब यह ‘बँटवारा’ बढ़ने लगा तो अपने प्रोजेक्ट में बेटे को भी उन्होंने शामिल कर लिया।नतीजा यह हुआ कि वह दोस्त आज उस महकमे का मंत्री है,जिसमें हम बड़े बाबू हैं।आलस्य से दुश्मनी करके आज हम फ़ाइलों के ढेर पर बैठे हैं और वह अँगूठा दबाकर राज्य की नित-नई योजनाएँ पास कर रहा है।

इस घटना का ही असर है कि अलसाए हुए लोग मुझे अच्छे लगने लगे।उन्हें किसी बात की जल्दी नहीं रहती।वे ट्रेन पकड़ने के मामले में भी इतने ही प्रतिबद्ध होते हैं जितने दैनिक रूप से कार्यस्थल पहुँचने में।प्लेटफ़ॉर्म में वे पहुँचते तभी हैं,जब गाड़ी रेंगने लगती है।इससे वे उबाऊ प्रतीक्षा से साफ़ बच जाते हैं।

देश में आलस्य वाले बहुमत में हैं।अपनी इसी आदत के कारण वे देश-सेवा का भी लाभ उठा लेते हैं।मतदान के दिन घर से बाहर ही नहीं निकलते।केवल तीस-बत्तीस फ़ीसद लोगों के वोट से सरकार बन जाती है।आलसियों के लिए सार्वजनिक छुट्टी बच्चों संग एंजॉय करना देश से बड़ी सेवा है।इससे चुनाव जीतने के लिए नेताजी को ज़्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ती।सारे आलसी यदि वोट देने निकल आएँ तो जो सरकार बनेगी,वह भी आलसी होगी।और एक अलसाई हुई सरकार न विकास पैदा कर सकती है ,न ताबड़तोड़ विदेश यात्राएँ।इसलिए देश की प्रगति में आलसियों का सबसे बड़ा योगदान है।
आलसी आदमी बड़ा संतोषी जीव होता है।उसके मन में न कुछ पाने की इच्छा होती है न कुछ उठाकर देने की।बैठे-बिठाए जितना उसे मिल जाता है,उसी में वह तृप्त हो लेता है।आलसी अध्यात्म और विज्ञान का एक साथ पक्षधर होता है।उसमें आला दर्जे की आस्तिकता होती है।ईश्वर-कृपा से जो मिल जाता है,उतना ही वह ग्रहण करता है।आलसियों की वजह से ऑनलाइन शॉपिंग का बाज़ार दिनोंदिन बढ़ रहा है।भारत में देशी-विदेशी कम्पनियाँ इन्हीं निठल्लों के चलते ख़ूब रोज़गार पैदा कर रही हैं।उनका पूरा टर्न-ओवर ही इन आलसियों के अस्तित्व पर निर्भर है।शुक्र है कि हर घर में ऐसे महत्वपूर्ण प्राणी होते हैं।यहाँ तक कि विज्ञान की कई खोजें आलसी-फ़्रेंडली हैं।चाहे देश में क्रान्ति का मामला हो या घर की शांति का,पाँच इंच के एक स्मॉर्टफ़ोन से वह दोनों मसले तुरत हल कर डालता है।

आलसी ग़ज़ब का तार्किक होता है।ग़लती से कोई भी कर्म उसके कर-कमलों द्वारा पुण्य-लाभ न ले जा पाए,इसके ठोस कारण उसके मुखारविंद में हमेशा मौजूद रहते हैं।असली आलसी हरदम पॉज़िटिव सोचता है।उसे यही लगता है कि आख़िरी मौक़े पर कोई न कोई चमत्कार ज़रूर होगा।किसी काम को पूरा करने के लिए उस पर लोग भले विश्वास न करते हों,पर उसके पास ग़ज़ब का आत्मविश्वास होता है।जहाँ दूसरे लोग ‘समय बड़ा क़ीमती है’ नामक फोबिया से हमेशा पीड़ित रहते हैं और समय को लेकर बड़े संवेदनशील होते हैं,वहीं आलसी बिलकुल बेपरवाह।समय ख़ुद कई बार ‘अलार्म’ बजाकर उन्हें झिझोड़ता है पर वे कभी भी अपने ऊपर किसी तरह के ख़तरे का ‘लोड’ नहीं लेते।वे अधिकतर काम अपनी मानसिक-मिसाइल से ही ध्वस्त कर देते हैं यानी ‘मन’ से काम करते हैं।शायद इसीलिए दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बिल गेट्स का मानना है कि मुश्किल काम के लिए वे आलसी व्यक्ति को चुनना पसंद करेंगे।तो यह है आलसियों की मार्केट-वैल्यू ! सरकार भी यह बात बख़ूबी जानती है।इसीलिए आलसी को परमानेंट-तैनाती मिलती है और हम जैसे कामकाजी दर-बदर घूमते हैं।

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

अंतरात्माओं की आवाज़ और बेचारी नैतिकता। !

अचानक एक साथ दो अंतरात्माएँ प्रकट हो गईं।एक को भ्रष्टाचार की आवाज़ सुनाई दी तो दूसरी को हत्या के आरोप की।अन्तरात्माओं की ख़ास बात यह है कि वे किसी के कहने पर नहीं आतीं।ऐन मुफ़ीद वक़्त पर वे आकाशवाणी करने लगती हैं।महागठबंधनब्रेकहुआ तो अंदरूनी आत्माओं ने मोर्चा संभाल लिया।ख़ास बात यह रही कि दोनों तरफ़ की पवित्रता बरक़रार रही।वे रहती ही इतने अंदर हैं जहाँ नैतिकता की चिड़िया भीबीटनहीं कर सकती।कुर्सी पर भले ही महान आत्माएँ बिराजती हों,पर उनकी जान अंतरात्माओं में ही बसती है।वे ही उन्हें बेदाग़ बचा ले जाती हैं।

अभी कुछ दिनों पहले इन्हीं अंतरात्माओं का सार्वजनिक आह्वान किया गया था पर वे ऐसे नहीं आतीं।वे किसी के आह्वान के विरुद्ध होती हैं।उन्हें यह क़तई नहीं पसंद कि उन पर कोई हुकुम चलाए।यहाँ तक कि इस बारे में वे अकसर अपनेधारककी भी नहीं सुनतीं।शरीर या उसकी आत्मा कुछ ग़लती कर भी सकती है पर अंतरात्मा ज़रा ऊँची और गहरी चीज़ होती है।उसको भेद पाना और उससे सवाल कर पाना किसी नैतिकता के प्रहरी का काम है ही किसी चैनल के अति-उत्साही रिपोर्टर का।

बहरहाल,अंतरात्मा की आवाज़ पर उन्होंने अपना इस्तीफ़ा उछाल दिया।वह ज़मीन पर गिरे कि उसके पहले ही बीच में आई बधाई उसमें बाधा बन गई।ये ऐसा तीर है जो छोड़ने के बाद भी वापस जाता है।एक ट्वीट ने दूसरे खेमे कोबीटकर दिया।देखते ही देखते वह ट्वीट इस्तीफ़े से बड़ी हो गई।अभी तक यह नहीं तय हो पाया कि इस्तीफ़ा पहले चला था या ट्वीट।पर इतना तो निश्चित है कि इस इस्तीफ़े के नीचे काफ़ी दुःखी आत्माएँ इकट्ठा हो गईं थीं।उन्होंने उसे बीच में ही ईमानदारी के कटोरे में लोंक लिया।इधर महागठबंधन टूटा,उधर ज्योतिषी दूसरे बंधन का मुहूर्त निकालने लगे।संयोग देखिए कि शुभ मुहूर्त नाग-पंचमी से ऐन पहले का मिल भी गया।

कहते हैं, संकट नैतिकता पर था।भ्रष्टाचार लगातार उस पर हथौड़े मार रहा था।जब दोनों में गठबंधन हुआ था तो भी नैतिकता की हालत गंभीर थी।उस वक़्त बेचारी धर्मनिरपेक्षता ने उसे बचा लिया था,नहीं नैतिकता तभी मारी जाती।बहरहाल,किसी की नैतिकता को कोई आँच नहीं आई और दोनों ओर की अंतरात्माएँ भी सुरक्षित हैं।

रविवार, 2 जुलाई 2017

गधे-घोड़ों का सेवा-मूल्य !

जीएसटी,जीएसटी का चौतरफ़ा हल्ला मचा हुआ है।बहुत सारे लोग चकरा गए हैं कि यह कौन-सी बला है भला ! पढ़े-लिखों की माने तो पूरे देश में अब एक समान कर व्यवस्था लागू होने जा रही है।सरकार ने अलग-अलग चीज़ों को उनकी उपयोगिता के मुताबिक़ बाँट दिया है ताकि निशानदेही में आसानी हो सके।कई चीज़ें जहाँ कर-मुक्त कर दी गई हैं,वहीं कुछ को ख़रीदने में ही मुक्ति वाली अवस्था प्राप्त की जा सकती है।कुछ लोग जीएसटी को 'गधा,घोड़ा सर्विस टैक्स' समझ रहे हैं।यह ग़लतफ़हमी उन्हें तब हुई ,जब उन्हें यह ख़बर मिली कि नए क़ानून के बाद गधों की ख़रीद-फ़रोख़्त पर कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा जबकि घोड़ों की ख़रीदारी पर भारी कर लगेगा।अब जीएसटी माने कुछ भी हो,पर सरकार नहीं चाहती कि आम आदमी को व्यापार में नुक़सान उठाना पड़े।गधा आम आदमी के ज़्यादा काम आता है इसलिए उस पर और बोझ नहीं लादा गया है।सरकार गधे और घोड़े दोनों का महत्व बख़ूबी जानती है।गधा हमेशा से बोझा ढोने वाला प्राणी रहा है।वह निहायत सहनशील और समझदार जीव है।बिना कोई सवाल किए ईंट,पत्थर और लकड़ी के गट्ठर समान भाव से ढोता रहता है।घोड़े की नस्ल ऊँची होती है और वह ख़ास लोगों के ही क़ाबू में आता है ।घोड़े पर यूँ ही नहीं कुछ अल्लम-ग़ल्लम लादा जा सकता।न ही कोई ऐरा-गैरा उसकी सवारी गाँठ सकता है।उसकी लगाम वही थाम सकता है,जो ख़ुद बेलग़ाम होता है।घोड़े उन्हीं को अपने ऊपर लादते हैं,जो पहले से ही जनता की सेवा से लदे होते हैं।ऐसे में घोड़े के गिरने का ख़तरा बना रहता है।इससे जनसेवा का पूरा पैकेज धराशायी होने की आशंका रहती है।बाज़ार में इनकी क़ीमत ऊँची इसीलिए रखी जाती है कि यदि ये गिरें तो भी मुँह सही-सलामत रहे।इसके उलट बाज़ार में गधों की माँग कभी नहीं रहती जबकि इनकी आपूर्ति अधिक होती है ।'हॉर्स-ट्रेडिंग' व 'रेसकोर्स' जैसी कुलीन परम्पराएँ और 'हॉर्स-पॉवर' जैसी नैसर्गिक विशेषता गधों में देखने को नहीं मिलती।गधे न बिकते हैं न बिदकते हैं,जबकि घोड़े दोनों गुणों में पारंगत होते हैं।एक बार बिकने पर उतारू हो जाँय तो सरकारें बना-बिगाड़ सकते हैं।उनमें ग़ज़ब की गति होती है।जहाँ ऊँची बोली लगी,वहीं हिनहिनाने लगते हैं।

रहन-सहन के मामले में भी दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।गधे खुले आसमान में विचरण करते हैं।वे कहीं भी लीद कर देते हैं इसीलिए उनकी मिट्टी पलीद होने का डर नहीं रहता।घोड़ों के लिए बक़ायदा अस्तबल होता है।वे उसके बिना नहीं रह सकते।पशुओं में घोड़े को आभिजात्य वर्ग का माना जाता है।प्राचीन काल में यदि किसी राजा को चक्रवर्ती बनने की इच्छा प्रबल होती तो वह घोड़ा छोड़ता था।'अश्वमेध-यज्ञ' संपूर्ण होने पर ही वह चक्रवर्ती सम्राट माना जाता था।आज भी उसकी शान बरक़रार है।यह प्राणी औरों से अधिक सम्वेदनशील होता है।इसे सर्दी भी जल्द सताती है और गरमी भी।जबकि गधा सारे मौसमों से बेफिक्र होता है।बारिश हो या धूप,उसे अपने रूप के नष्ट होने की आशंका नहीं रहती।कहीं भी अपनी टाँगें पसार देता है।वह मान-अपमान से परे होता है।गधे का चेहरा हरदम भावशून्य रहता है।शायद इसीलिए उसको कोई भाव नहीं देता।यही वजह है कि अभिनय के मामले में वह बिलकुल फिसड्डी होता है।भारी बोझा या टेढ़ी बात उसको विचलित नहीं करती।कितना भी बोझ लदा हो,तब भी उसके पास अतिरिक्त 'स्पेस' होता है।दो-चार गालियों से उसका कुछ बिगड़ता नहीं।वह पलट के दुलत्ती भी नहीं लगाता।अपशब्द सुनना और तिरस्कार सहना उसकी आदत में शुमार है।इससे गधे की गुणवत्ता तो बढ़ती है पर क़ीमत नहीं।'अबे गधे' कहकर किसी की भी मार्केट-वैल्यू ज़मींदोज़ की जा सकती है।इन विलक्षण गुणों के चलते वह संत-कोटि में आता है।अब ऐसे सीधे,निरीह और स्थितिप्रज्ञ जीव पर गरीबसेवी सरकार किस मुँह से अधिभार लगाए?

मुंशी प्रेमचंद ने इस जीव को बहुत पहले परख लिया था।वे इसको जानवरों में सबसे बुद्धिमान मानते थे।लेकिन आज भी यह आदमियों के बीच बेवक़ूफ़ समझा जाता है।सच तो यह है कि बुद्धिमान से बेवक़ूफ़ कहीं अधिक दमदार होता है।उसमें न कोई बनावट होती है और न कोई मिलावट की जा सकती है।सरकार ने इसीलिए इसे 'अमूल्य' घोषित किया है।

दूसरी तरफ़ घोड़ा पूरी तरह यथार्थवादी होता है।बिदकने को लेकर उसके मन में कभी कोई सशोपंज नहीं होता।शादी-ब्याह में फूफा और जीजा की तरह उसका मूड पता नहीं कब ख़राब हो जाय,इसलिए उस पर सेवा का ‘प्रकोप’ भी अधिक होता है।जब तक उसको ढंग से घास नहीं डाली जाती,वह शांत नहीं रहता।कहावत है,घोड़ा घास से यारी करेगा तो क्या खाएगा ! इसी परम्परा को क़ायम रखने के लिए वह हमेशा कटिबद्ध रहता है।हरी-भरी घास के लिए वह कहीं भी और कभी भी मुँह मार सकता है।गधे पंजीरी फाँकते हैं और ख़ुश रहते हैं।ये आदमी की सेवा ख़ूब करते हैं पर वो ’स्किल’ नहीं पैदा कर पाते,जिसमें घोड़े निपुण होते हैं।दोनों की तुलना कहाँ ? ये मुँह खोलते हैं तो भी रेंकते हैं।वो हिनहिनाते भी हैं तो बयान झड़ते हैं।सेवा करना बड़े स्किल की बात है इसीलिए गधों को सेवा-श्रेणी से बाहर रखा गया है और घोड़ों को अंदर।

रविवार, 7 मई 2017

मित्रता पर ऑनलाइन वज्रपात !

वे मित्र थे।अब नहीं रहे।पिछली रात जब हम सोए थे,सब कुछ ठीक-ठाक था।यह जानकर हमने इत्मीनान की नींद ली थी कि उनके फेसबुकी दिल में अपन महफूज हैं।सुबह उठे तो देखा;ठुकराए प्रेमी के गुलदस्ते की तरह अपन उनके फेसबुकी दरवाजे पर मुरझाए पड़े हैं।दरवाजा अंदर से कसकर बंद है।धूल झाडक़र अंदर जाने की कोशिश की, तो यह जानकर दिल बैठ गया कि दरवाजा लॉक है और हम ब्लॉक !
मित्र गहरे थे इसलिए हम भी गहराई में डूब गए।भूकंप की तरह फेसबुक में ब्लॉक हो जाने का पूर्वानुमान अभी तक नहीं लग सका है।हमने तुरंत इस हादसे की खबर दूसरे मित्र से फ़ोन पर साझा की।सुनते ही वे टूट पड़े-गलती तुम्हारी है।तुम दो दिन पहले देशभक्ति और नैतिकता पर उनसे खूब बहसियाये थे।उनसे तार्किक जवाब पाने की अशिष्ट कोशिश भी की थी।अब भुगतो।पर वे तो कल तक मेरी इसी अशिष्टता के धुर प्रशंसक थे।अचानक ऐसा क्या हुआ ? ’ उदासी को फोन में टैग कर हमने मित्र की ओर सवाल उछाल दिया।मित्र तैयार थे,पलटकर बोले-पहले मैं भी चेक कर लूं कि इस वक्त उनका मित्र हूँ कि नहीं।दो मिनट बाद ही राहत की साँस लेते हुए उन्होंने बताया कि फ़िलहाल वे इस अनिष्ट से बच गए हैं।साथ ही इसके समर्थन में उन्होंने यह तर्क भी जोड़ दिया कि उनका शनि बहुत मजबूत स्थान पर बैठा हुआ है और वे खुद भी पहुँचे हुए सनीचर हैं।हम अवाक् रह गए।इस कोण से तो हमने सोचा ही नहीं संयोग से यह वाकया शनिवार को ही घटित हुआ था।शायद इसीलिए वे बच गए और हम पर गाज गिर गई। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह कि अब हमारा  क्या होगा ?इसी उधेड़बुन में दुनिया में अपनी मुँह-दिखाई के तमाम विकल्पों पर हम विचार करने लगे।


मित्र ने इसका भी फ़ौरी समाधान कर दिया।बोले-ऐसा करो,कुछ दिनों के लिए तुम भूमिगत हो जाओ।मेरा मतलब मित्रता का खाता ही बंद कर दो।इससे ब्लॉक से पड़ने वाले विपरीत प्रभाव से बचा जा सकता है।उसने तुम्हें ब्लॉक किया है,तुम सबके लिए ब्लॉक हो जाओ।’ ‘लेकिन अभी कल ही हमने साहित्य-महोत्सव की अपनी ढेरों फोटुएँ फेसबुक को समर्पित की हैं,उन पर ठीक तरह से लाइक और कमेन्ट तो जाने दो।यह मौक़ा हाथ से निकल गया तो साहित्यकार बनने की अंतिम सम्भावना भी नष्ट हो जाएगी।हम आर्तनाद कर उठे।उन्होंने हमें गहरे संकट से उबारने की कोशिश जारी रखी।कहने लगे--फिर ठीक है।अब तुम अपने अनब्लॉक होने की प्रतीक्षा करो।ऐसे लोग प्रतिक्रिया जानने के लिए ज्यादा देर तक इंतज़ार नहीं करते।किसी दूसरी पहचान से तुम्हारी गतिविधि अभी भी देख रहे होंगे।तुम्हें रणनीति बनानी होगी तभी तुम्हारी मित्रता फिर से ऐक्टिवेट हो सकती है।तुम मुझे अपना गुरू मानते हो,इसलिए इसका गुर तुम्हें बता रहा हूँ।तुम उनकी किताब पर एक झटपट-समीक्षा लिख दो।अब यह मत पूछना कि कौन-सी टाइप की।तुम इसमें कुशल हो और तुम्हारे इसी हुनर का मैं भी क़ायल हूँ।इस समीक्षा को फ़ेसबुक पर प्रसारित कर दो।फिर देखना जल्द ही तुम्हें सम्पूर्ण निर्वाण की प्राप्ति होगी।मरी हुई मित्रता संजीवनी पाकर चहक उठेगी।'


ऐसे परम शुभचिंतक मित्र से बात करने के बाद मैं काफ़ी हल्का हो गया।फेसबुक की मेरी मित्रसूची पहले ही हल्की होकर पाँच हज़ार से सीधे चार हज़ार नौ सौ निन्यान्नवे पर चुकी थी।लग रहा था जैसे एक ही कारोबारी-सत्र में निफ्टी-सूचकांक एकदम से बैठ गया हो ! उस मित्र के एक क्लिक ने मुझे शीर्ष पायदान से नीचे ढकेल दिया था।मित्रता की सारी मेमोरी एक ही बटन से डिलीट हो गई थी मैं स्मृति-शून्य हो चुका था।यह काम घुप्प अँधेरे में हुआ था।इसलिए कि अँधेरे में ट्रिगर दबाने से आत्मग्लानि की आशंका न्यूनतम होती है सारे चौर्य सॉरी शौर्य-कर्म  अंधेरे में ही किये जाते हैं।इससे नैतिकता भी बेदाग बनी रहती है।
मैं अभी इस दुर्घटना से पूरी तरह उबरा भी नहीं था कि श्रीमती जी ने पूछताछ शुरू कर दी-‘ये सुबह से क्या ब्लॉक-ब्लॉक लगाए हो ? हम तो अभी वाशरूम से आये हैं।फ्लश भी सही ढंग से काम कर रहा है।जाओ तुम भी हल्के हो लो ?’ मैंने निवेदन किया,‘भागवान मैं ऑलरेडी हल्का हो चुका हूँ।अब और अफोर्ड नहीं कर सकता।दरअसल बात यह है कि मेरे एक मित्र ने मुझे फेसबुक में ब्लॉक कर दिया है।इतना सुनते ही श्रीमती जी मुझे धिक्कारने लगीं-तुमसे एक भी काम ठीक से नहीं सधता ! एक मित्र को साधने में भी तुम सफल नहीं हो पाए।इस मुए ब्लॉक से हम पर दुखों का पहाड़ टूट सकता है।अगर यह बात खुल गई तो सामने वाला रग्घू बनिया उधारी देना बंद कर देगा।मुझे तो यही चिन्ता खाए जा रही है।

इस घोर संकट की तरफ़ हमारा ध्यान ही नहीं गया था।एक ब्लॉक ऐसे दुर्दिन भी दिखा सकता है,कभी सोचा था।बहरहाल,उनकी किताब की समीक्षा में मैं अपनी सम्भावना देखने लगा हूँ।