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शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

अंतरात्माओं की आवाज़ और बेचारी नैतिकता। !

अचानक एक साथ दो अंतरात्माएँ प्रकट हो गईं।एक को भ्रष्टाचार की आवाज़ सुनाई दी तो दूसरी को हत्या के आरोप की।अन्तरात्माओं की ख़ास बात यह है कि वे किसी के कहने पर नहीं आतीं।ऐन मुफ़ीद वक़्त पर वे आकाशवाणी करने लगती हैं।महागठबंधनब्रेकहुआ तो अंदरूनी आत्माओं ने मोर्चा संभाल लिया।ख़ास बात यह रही कि दोनों तरफ़ की पवित्रता बरक़रार रही।वे रहती ही इतने अंदर हैं जहाँ नैतिकता की चिड़िया भीबीटनहीं कर सकती।कुर्सी पर भले ही महान आत्माएँ बिराजती हों,पर उनकी जान अंतरात्माओं में ही बसती है।वे ही उन्हें बेदाग़ बचा ले जाती हैं।

अभी कुछ दिनों पहले इन्हीं अंतरात्माओं का सार्वजनिक आह्वान किया गया था पर वे ऐसे नहीं आतीं।वे किसी के आह्वान के विरुद्ध होती हैं।उन्हें यह क़तई नहीं पसंद कि उन पर कोई हुकुम चलाए।यहाँ तक कि इस बारे में वे अकसर अपनेधारककी भी नहीं सुनतीं।शरीर या उसकी आत्मा कुछ ग़लती कर भी सकती है पर अंतरात्मा ज़रा ऊँची और गहरी चीज़ होती है।उसको भेद पाना और उससे सवाल कर पाना किसी नैतिकता के प्रहरी का काम है ही किसी चैनल के अति-उत्साही रिपोर्टर का।

बहरहाल,अंतरात्मा की आवाज़ पर उन्होंने अपना इस्तीफ़ा उछाल दिया।वह ज़मीन पर गिरे कि उसके पहले ही बीच में आई बधाई उसमें बाधा बन गई।ये ऐसा तीर है जो छोड़ने के बाद भी वापस जाता है।एक ट्वीट ने दूसरे खेमे कोबीटकर दिया।देखते ही देखते वह ट्वीट इस्तीफ़े से बड़ी हो गई।अभी तक यह नहीं तय हो पाया कि इस्तीफ़ा पहले चला था या ट्वीट।पर इतना तो निश्चित है कि इस इस्तीफ़े के नीचे काफ़ी दुःखी आत्माएँ इकट्ठा हो गईं थीं।उन्होंने उसे बीच में ही ईमानदारी के कटोरे में लोंक लिया।इधर महागठबंधन टूटा,उधर ज्योतिषी दूसरे बंधन का मुहूर्त निकालने लगे।संयोग देखिए कि शुभ मुहूर्त नाग-पंचमी से ऐन पहले का मिल भी गया।

कहते हैं, संकट नैतिकता पर था।भ्रष्टाचार लगातार उस पर हथौड़े मार रहा था।जब दोनों में गठबंधन हुआ था तो भी नैतिकता की हालत गंभीर थी।उस वक़्त बेचारी धर्मनिरपेक्षता ने उसे बचा लिया था,नहीं नैतिकता तभी मारी जाती।बहरहाल,किसी की नैतिकता को कोई आँच नहीं आई और दोनों ओर की अंतरात्माएँ भी सुरक्षित हैं।

रविवार, 2 जुलाई 2017

गधे-घोड़ों का सेवा-मूल्य !

जीएसटी,जीएसटी का चौतरफ़ा हल्ला मचा हुआ है।बहुत सारे लोग चकरा गए हैं कि यह कौन-सी बला है भला ! पढ़े-लिखों की माने तो पूरे देश में अब एक समान कर व्यवस्था लागू होने जा रही है।सरकार ने अलग-अलग चीज़ों को उनकी उपयोगिता के मुताबिक़ बाँट दिया है ताकि निशानदेही में आसानी हो सके।कई चीज़ें जहाँ कर-मुक्त कर दी गई हैं,वहीं कुछ को ख़रीदने में ही मुक्ति वाली अवस्था प्राप्त की जा सकती है।कुछ लोग जीएसटी को 'गधा,घोड़ा सर्विस टैक्स' समझ रहे हैं।यह ग़लतफ़हमी उन्हें तब हुई ,जब उन्हें यह ख़बर मिली कि नए क़ानून के बाद गधों की ख़रीद-फ़रोख़्त पर कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा जबकि घोड़ों की ख़रीदारी पर भारी कर लगेगा।अब जीएसटी माने कुछ भी हो,पर सरकार नहीं चाहती कि आम आदमी को व्यापार में नुक़सान उठाना पड़े।गधा आम आदमी के ज़्यादा काम आता है इसलिए उस पर और बोझ नहीं लादा गया है।सरकार गधे और घोड़े दोनों का महत्व बख़ूबी जानती है।गधा हमेशा से बोझा ढोने वाला प्राणी रहा है।वह निहायत सहनशील और समझदार जीव है।बिना कोई सवाल किए ईंट,पत्थर और लकड़ी के गट्ठर समान भाव से ढोता रहता है।घोड़े की नस्ल ऊँची होती है और वह ख़ास लोगों के ही क़ाबू में आता है ।घोड़े पर यूँ ही नहीं कुछ अल्लम-ग़ल्लम लादा जा सकता।न ही कोई ऐरा-गैरा उसकी सवारी गाँठ सकता है।उसकी लगाम वही थाम सकता है,जो ख़ुद बेलग़ाम होता है।घोड़े उन्हीं को अपने ऊपर लादते हैं,जो पहले से ही जनता की सेवा से लदे होते हैं।ऐसे में घोड़े के गिरने का ख़तरा बना रहता है।इससे जनसेवा का पूरा पैकेज धराशायी होने की आशंका रहती है।बाज़ार में इनकी क़ीमत ऊँची इसीलिए रखी जाती है कि यदि ये गिरें तो भी मुँह सही-सलामत रहे।इसके उलट बाज़ार में गधों की माँग कभी नहीं रहती जबकि इनकी आपूर्ति अधिक होती है ।'हॉर्स-ट्रेडिंग' व 'रेसकोर्स' जैसी कुलीन परम्पराएँ और 'हॉर्स-पॉवर' जैसी नैसर्गिक विशेषता गधों में देखने को नहीं मिलती।गधे न बिकते हैं न बिदकते हैं,जबकि घोड़े दोनों गुणों में पारंगत होते हैं।एक बार बिकने पर उतारू हो जाँय तो सरकारें बना-बिगाड़ सकते हैं।उनमें ग़ज़ब की गति होती है।जहाँ ऊँची बोली लगी,वहीं हिनहिनाने लगते हैं।

रहन-सहन के मामले में भी दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।गधे खुले आसमान में विचरण करते हैं।वे कहीं भी लीद कर देते हैं इसीलिए उनकी मिट्टी पलीद होने का डर नहीं रहता।घोड़ों के लिए बक़ायदा अस्तबल होता है।वे उसके बिना नहीं रह सकते।पशुओं में घोड़े को आभिजात्य वर्ग का माना जाता है।प्राचीन काल में यदि किसी राजा को चक्रवर्ती बनने की इच्छा प्रबल होती तो वह घोड़ा छोड़ता था।'अश्वमेध-यज्ञ' संपूर्ण होने पर ही वह चक्रवर्ती सम्राट माना जाता था।आज भी उसकी शान बरक़रार है।यह प्राणी औरों से अधिक सम्वेदनशील होता है।इसे सर्दी भी जल्द सताती है और गरमी भी।जबकि गधा सारे मौसमों से बेफिक्र होता है।बारिश हो या धूप,उसे अपने रूप के नष्ट होने की आशंका नहीं रहती।कहीं भी अपनी टाँगें पसार देता है।वह मान-अपमान से परे होता है।गधे का चेहरा हरदम भावशून्य रहता है।शायद इसीलिए उसको कोई भाव नहीं देता।यही वजह है कि अभिनय के मामले में वह बिलकुल फिसड्डी होता है।भारी बोझा या टेढ़ी बात उसको विचलित नहीं करती।कितना भी बोझ लदा हो,तब भी उसके पास अतिरिक्त 'स्पेस' होता है।दो-चार गालियों से उसका कुछ बिगड़ता नहीं।वह पलट के दुलत्ती भी नहीं लगाता।अपशब्द सुनना और तिरस्कार सहना उसकी आदत में शुमार है।इससे गधे की गुणवत्ता तो बढ़ती है पर क़ीमत नहीं।'अबे गधे' कहकर किसी की भी मार्केट-वैल्यू ज़मींदोज़ की जा सकती है।इन विलक्षण गुणों के चलते वह संत-कोटि में आता है।अब ऐसे सीधे,निरीह और स्थितिप्रज्ञ जीव पर गरीबसेवी सरकार किस मुँह से अधिभार लगाए?

मुंशी प्रेमचंद ने इस जीव को बहुत पहले परख लिया था।वे इसको जानवरों में सबसे बुद्धिमान मानते थे।लेकिन आज भी यह आदमियों के बीच बेवक़ूफ़ समझा जाता है।सच तो यह है कि बुद्धिमान से बेवक़ूफ़ कहीं अधिक दमदार होता है।उसमें न कोई बनावट होती है और न कोई मिलावट की जा सकती है।सरकार ने इसीलिए इसे 'अमूल्य' घोषित किया है।

दूसरी तरफ़ घोड़ा पूरी तरह यथार्थवादी होता है।बिदकने को लेकर उसके मन में कभी कोई सशोपंज नहीं होता।शादी-ब्याह में फूफा और जीजा की तरह उसका मूड पता नहीं कब ख़राब हो जाय,इसलिए उस पर सेवा का ‘प्रकोप’ भी अधिक होता है।जब तक उसको ढंग से घास नहीं डाली जाती,वह शांत नहीं रहता।कहावत है,घोड़ा घास से यारी करेगा तो क्या खाएगा ! इसी परम्परा को क़ायम रखने के लिए वह हमेशा कटिबद्ध रहता है।हरी-भरी घास के लिए वह कहीं भी और कभी भी मुँह मार सकता है।गधे पंजीरी फाँकते हैं और ख़ुश रहते हैं।ये आदमी की सेवा ख़ूब करते हैं पर वो ’स्किल’ नहीं पैदा कर पाते,जिसमें घोड़े निपुण होते हैं।दोनों की तुलना कहाँ ? ये मुँह खोलते हैं तो भी रेंकते हैं।वो हिनहिनाते भी हैं तो बयान झड़ते हैं।सेवा करना बड़े स्किल की बात है इसीलिए गधों को सेवा-श्रेणी से बाहर रखा गया है और घोड़ों को अंदर।